15 अगस्त-स्वतंत्रता दिवस, 2025 का संदेश!

इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस विगत वर्षों की तुलना में एक नये अंदाज में आने जा रहा है। इसके संकेत संसद से ‌लेकर सड़क तक दिखाई देने लगे हैं। जितना गर्म तापमान संसद की बंद दीवारों के भीतर का है। अब सड़कें भी उसी रफ्तार से गर्म होने लगी हैं। 21 जुलाई को संसद का मानसून सत्र शुरू हुआ था। उससे महीनों पहले से विपक्ष संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग कर रहा था। उसकी मांग थी कि पहलगाम आतंकी हमला, ऑपरेशन सिंदूर और युद्ध विराम के बाद की परिस्थितियों पर संसद में विशेष चर्चा हो।

जिससे देश को इन घटनाओं से संबंधित सभी तथ्यात्मक जानकारी मिल सके। लेकिन सरकार हठ पूर्वक अड़ी रही कि वह अलग से सत्र नहीं बुलाएगी। इस मांग को शांत करने के लिए परंपरा को दरकिनार करते हुए समय से बहुत पहले मानसून सत्र की घोषणा कर दी गई। पिछले दो-तीन महीनों में देश में तूफानी घटनाएं घटित हो रही थीं। इसलिए यह उम्मीद पहले से ही थी कि संसद का मानसून सत्र हंगामेदार होगा। 

21 जुलाई को संसद का सत्र शुरू होते ही विपक्ष ने ऑपरेशन सिंदूर और युद्ध विराम पर बहस की मांग उठा दी। सरकार इसके लिए तैयार नहीं थी। जिसका परिणाम हुआ कि तीन-चार दिन तक सदन नहीं चल सका। बाद में विपक्ष के साथ मिलकर लोकसभा अध्यक्ष ने पहलगाम से लेकर युद्ध विराम तक पर 16 घंटे की सदन में चर्चा कराने की घोषणा की। जिससे वातावरण थोड़ा सामान्य हुआ। 

वहीं उच्च सदन में भी यही स्थिति थी। लेकिन वहां एक विशेष घटना घट गई। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ जो राज्यसभा के पदेन सभापति हैं। उन्होंने विपक्ष द्वारा हस्ताक्षरित महाभियोग से संबंधित पत्र को स्वीकार कर लिया। जो जस्टिस विक्रम वर्मा के यहां मिले नोटों के संदर्भ में था। सदन के नेता भाजपा अध्यक्ष तथा मंत्री जेपी नड्डा ने महाभियोग के प्रस्ताव के संदर्भ में जो कुछ कहा। उससे वातावरण खराब हुआ और उसे पीठासीन उपराष्ट्रपति को चेतावनी के बतौर देखा गया। उसी समय आभास हो गया था कि मोदी सरकार सदन को किस दिशा में ले जाना चाहती है। सदन में मौजूद भाजपा के मंत्रियों ने इस संदर्भ में उपसभापति धनखड़ को संदेश देना चाहा। शायद वे उस संदेश की गंभीरता को समझ नहीं सके।

रात नौ बजे के बाद अप्रत्याशित खबर आई कि उपराष्ट्रपति धनखड़ ने स्वास्थ्य का हवाला देकर पद से इस्तीफा दे दिया है। मानसून सत्र के पहले दिन उपराष्ट्रपति द्वारा त्यागपत्र देना बड़ा धमाका था। प्रेक्षक आश्चर्यचकित थे कि राज्यपाल के कार्यकाल से लेकर उपराष्ट्रपति तक‌ धनखड़ सरकार के आक्रामक रक्षक रहे हैं। तो 8 घंटे के अंदर ऐसा क्या हुआ कि उन्हें रात्रि 9 बजे त्यागपत्र देना पड़ गया। धनखड़ का इस्तीफा हुए 21 दिन हो चुके हैं। लेकिन अभी तक रहस्य से पर्दा नहीं हटा है ।    

आश्चर्य की बात यह है कि त्यागपत्र देने के बाद से जगदीप धनखड़ सार्वजनिक मंच से गायब हैं। विपक्ष के सांसदों के साथ नागरिक समाज उनके स्वास्थ्य और उनकी स्थिति को लेकर चिंतित है। यहां तक कि कपिल सिब्बल ने ट्विटर पर लिखकर गृहमंत्री तक से मांग की है कि वह धनखड़ साहब की वास्तविक स्थिति के बारे में सदन और देश को अवगत करायें। जिससे फैल रही अफवाहों पर विराम लग सके। प्रेक्षक यहां एक बात को गंभीरता से नोट कर रहे हैं कि दिल्ली एनसीआर के आसपास जाट नेताओं के साथ सरकार का व्यवहार बदलता जा रहा है।

सत्यपाल मलिक से शुरू होकर जगदीप धनखड और राजस्थान के एक बड़े नेता को भाजपा ने अनुशासनहीनता के आरोप पर पार्टी से निष्कासित कर दिया है।क्या हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के जाट नेताओं को सरकार कोई संदेश देना चाह रही है। क्योंकि यही क्षेत्र किसान आंदोलन का केंद्रीय इलाका था। ऐसा लगता है कि अमेरिका-यूके (से समझौता हो चुका है) से फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर सरकार देर सबेर समझौता कर लेगी। उसे भविष्य में किसी बड़े किसान आंदोलन का खतरा दिखाई दे रहा है। इसलिए वह नई तैयारी में जुटी है। मामला कुछ इससे ज्यादा गंभीर लग रहा है।

बिहार में सघन मतदाता पुनरीक्षण कराने का चुनाव आयोग ने आनन-फानन में घोषणा की और तेज गति से इसे लागू किया गया। विपक्ष तथा नागरिक समाज द्वारा आपत्ति करने के बाद भी सरकार एसआईआर पर डटी रही। जिससे बिहार सहित सम्पूर्ण देश में राजनीतिक भूचाल आ गया है। एसआईआर की घोषणा के साथ खबर आने लगी कि लगभग 65 लाख वोटर बिहार में फर्जी हो सकते हैं।एसआईआर कराने के उद्देश्य, समय और मान्य दस्तावेजों को लेकर राजनीतिक दलों लोकतांत्रिक संस्थाओं ने अनेक प्रश्न उठाए गए तथा आशंका व्यक्त की ।

बिहार जैसे पिछड़े राज्य में एसआईआर की प्रक्रिया से नागरिकों के बुनियादी अधिकारों का हनन होगा। लाखों गरीब भूमिहीन मजदूर किसानों के साथ प्रवासी बिहारी मतदान के अधिकार से वंचित हो जाएंगे। भविष्य में उनकी नागरिकता भी खतरे में पड़ेगी। 

चुनाव आयोग ने सभी आशंकाओं और सुझावों को दरकिनार कर दिया और लगभग 25 दिन में ही 8 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के पंजीकरण का ऐलान कर दिया। फॉर्म भरे जाने लगे। बीएलओ से लेकर एसआईआर में लगे सरकारी तंत्र और कार्यकर्ताओं में जिस तरह की अफरातफरी देखी गई। वह अभूतपूर्व  परिघटना है। 

 एसआईआर की प्रक्रिया बताती है कि मोदी सरकार ऐसे कार्यक्रम और नीतियां लेकर आती है। जिससे संपूर्ण समाज में अराजकता पैदा हो। अफरातफरी मचे। लाखों करोड़ों लोग बदहवास सा इधर-उधर भागते हुए दस्तावेज कागज पत्तर जुटाने लगें। संपत्ति जीवन और वजूद की रक्षा के संघर्ष में इस कदर उलझ जाएं कि उनका वजूद ही दांव पर लग जाए। भ्रष्ट तंत्र को आपदा में अवसर तलाशने का भरपूर मौका मिले। भ्रष्टाचार फले-फूले और नागरिक हताश परेशान होकर एक हद तक टूट जाएं।

देश ने नोटबंदी और कोविद के समय लॉकडाउन में सैकड़ों लोगों को मारते हुए देखा है। इस जीवन श्रम और सम्पत्ति की हुई बर्बादी के लिए एकमात्र दोषी मोदी हैं। मोदी द्वारा घोषित नीतियां और कार्यक्रम हैं। आश्चर्य तो तब होता है जब करोड़ों नागरिकों के दुर्दशा पर मोदी और अट्टहास करते हुए कहते हैं कि देखो काले धन वालों की मैंने क्या दुर्दशा कर दी है।

इस तरह से आईएसआर लागू हो गया ।चारों तरफ भागमभाग के बीच 26 जुलाई तक का पहला चरण पूरा हुआ। 1 अगस्त को चुनाव आयोग ने प्राप्त हुए दस्तावेजों के आधार पर घोषणा करते हुए कहा कि 7 करोड़ से ज्यादा लोगों ने फॉर्म भरा है। 65 लाख से ज्यादा वोटर विभिन्न कारणों से अनुपस्थित पाए गए।जिसमें मृतक, स्थाई रूप से पलायन कर गए प्रवासी वोटरों के साथ वे लोग शामिल हैं। जिन्होंने दो-दो वोटर कार्ड बनवा रखे थे। चुनाव आयोग का एसआईआर का निर्णय बिहार में बड़े जना आंदोलन का रूप ले रहा है। लगता है कि मोदी सरकार का यह निर्णय उसके लिए संकट खड़ा कर सकता है। लगता है लोकतंत्र की दिशा उलट गई है पहले नागरिक सरकार चुनते थे। अब सरकार नागरिक चुनेगी।

तीसरा मुद्दा- पहलगाम में आतंकी हमले में मारे गए पर्यटकों के बाद ऑपरेशन सिंदूर के नाम से हुई सैनिक कार्रवाई और युद्ध विराम के बाद आ रही सूचनाओं ने मोदी सरकार के दावों को संदिग्ध बना दिया है। 30 से अधिक बार ट्रंप द्वारा युद्ध विराम कराने की घोषणा ने मोदी की साख को धूल में मिला दिया। भारतीय विमानों के गिराए जाने, युद्ध में शहीद हुए सैनिकों तथा पुंछ राजौरी क्षेत्र में हुए नागरिकों के जान-माल की क्षति ने ऑपरेशन सिंदूर की सफलता पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है।

अलग-अलग मंचों पर सरकार और सैन्य अधिकारियों के बयानों में तालमेल नहीं है। अब डैमेज कंट्रोल करने के लिए वायु सेना अध्यक्ष की तरफ से 6 पाकिस्तानी विमानों के मार गिराए जाने का बयान 3 महीने बाद आया है। जबकि पूरे प्रकरण पर संसद में 16 घंटे की बहस हो चुकी है। संसद में रक्षा मंत्री गृह मंत्री और प्रधानमंत्री तक ने ऐसा कोई दावा नहीं किया था। यानी मोदी सरकार अपने नकारेपन और आपराधिक लापरवाही की जवाब देही से बचने के लिए सेना के पीछे छिपने लगी है।

वहीं संसद की बहस में एक भी सवाल का जवाब प्रधानमंत्री मोदी और उनके लिए सहयोगियों ने नहीं दिया। मोदी से एक मांग रखी गई थी कि वह कह दें कि ट्रंप का दावा झूठा है। लेकिन मोदी की जुबान पर ट्रंप का नाम नहीं आया। क्या मजबूरी हो सकती है।यह आप खुद सोचिए।

विपक्ष ने सर्वसम्मत से संसद में एसआईआर पर बहस कराने की मांग की। सरकार द्वारा बहस कराने से इनकार करने के बाद मुद्दा तूल पकड़ गया। इस समय संसद “वोट चोर गद्दी छोड़ “के नारे से गूंज रही है। जैसे-जैसे सरकार की हठधर्मिता बढ़ती गई। वैसे-वैसे संसद की आवाज सड़कों की तरफ पहुंचने लगी। इंडिया गठबंधन तथा उससे बाहर के भी सांसद एकजुट होकर रोज संसद के बाहर प्रदर्शन करने लगे। एक मंजिल ऐसी आई कि 3 सौ से ज्यादा संसद सदस्य संसद से चुनाव आयुक्त कार्यालय तक पैदल मार्च के लिए सड़कों पर निकल पड़े। जिसे पुलिस ने रोक दिया और सांसदों को गिरफ्तार कर लिया।  इसके बाद “वोट चोर गद्दी छोड़ “का नारा‌ आम जनता का नारा बनने लगा है।

हरियाणा विधानसभा के चुनाव के बाद महाराष्ट्र में विधानसभा के चुनाव हुए।चुनाव के दौरान जिस तरह का माहौल था। उसमें एनडीए के जीतने की कोई संभावना नहीं दिखाई दे रही थी। लेकिन चुनाव परिणाम प्रेक्षकों  और आम जनता के मूल्यांकन से ठीक उलट आए।महाराष्ट्र के एक गांव के  वोटर चुनाव परिणाम से संतुष्ट नहीं थे । उन्होंने मॉक पोलिंग कराने का निश्चय किया। उनका कहना था कि यहां 90% वोट इंडिया गठबंधन को गया है। मॉक पोलिंग की तैयारी हो चुकी थी।

जिस दिन वोट पड़ने थे। पुलिस ने गांव को घेर लिया और धारा 44 लगाकर मॉक पोलिंग को रोक दिया। इससे लोगों की आशंका को बल मिला। विभिन्न संगठन राजनीतिक पार्टियां इस निष्कर्ष पर पहुंची कि कोई न कोई गड़बड़ी हो रही है। छानबीन शुरू हुई तो पता चला कि अहमदनगर जिले के एक मकान में 5 हजार मतदाता पाए गए। इस जानकारी ने स्थिति को और जटिल बना दिया।

जन भावना विपरीत होने के बाद भी भाजपा क्यों जीत रही है। यह सवाल चारों तरफ से उठने लगा। इस गुत्थी को सुलझाने की कांग्रेस ने तैयारी की। इसके लिए उन्होंने चुनाव आयोग से कई तरह के डॉक्यूमेंट मांगे। लेकिन चुनाव आयोग डॉक्यूमेंट देने में तरह-तरह की चाल खेलने लगा। जिससे आशंकाएं और गहरी हो गईं।      

इसलिए टेस्ट केस के बतौर कांग्रेस ने बंगलोर शहर की लोकसभा सीट की एक विधानसभा महादेवपुरा को चुना। क्योंकि इस सीट पर चुनाव परिणाम विधानसभा की तुलना में एकदम विपरीत आया था। चुनाव आयोग से डॉक्यूमेंट मांगें गये। उसने डिजिटल फॉर्म में न देकर प्रिंट फॉर्म में 7 फीट ऊंचे दस्तावेजों का भारी भरकम बंडल थमा दिया। जिसको पढ़ना समझना फोटो मिलाना और ठोस निष्कर्ष पर पहुंचना कठिन काम था। लेकिन कांग्रेस ने कमिटमेंट दिखाया। कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए साख बचाने का सवाल था। 30-35 कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों की टीम लगाई। संपूर्ण डॉक्यूमेंट की जांच पड़ताल की और एक मुकम्मल रिपोर्ट तैयार हुई। चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। जिसे राहुल गांधी ने प्रेस कांफ्रेंस द्वारा देश के समक्ष‌ रखा।

एलओपी राहुल गांधी ने जिस तरह से बेंगलुरु के महादेवपुरा विधानसभा के वोटर लिस्ट के अंदर छिपी गड़बड़ी को प्रेस के समक्ष रखा। उससे चुनाव आयोग और मोदी सरकार बैक फुट पर आ गई है। इस वोटर पैटर्न के खुलासे ने 2019 से अब तक के समस्त चुनावों की वैधता पर प्रश्न खड़ा कर दिया है। मोदी सरकार मुजरिम की तरह जनता की अदालत में खड़ी है। इससे बच निकलने का उसके पास कोई रास्ता नहीं दिखाई दे रहा है।

अपने बुने जाल में फंसी मोदी सरकार हताशा में कई ऐसे कदम उठा रही है। जो उसके लिए विपरीत परिणाम दे सकते हैं। चुनाव आयोग कानूनी दाव पेंच खेल रहा है और राहुल गांधी को धमकाने डराने पर उतर आया है। लेकिन सवाल लोकतंत्र की सबसे बड़ी अदालत यानी जनता के बीच पहुंच गया है। जहां समुद्र मंथन चल रहा है।

ट्रंप की जीत पर भारत में हिंदुत्व वादियों ने जश्न मनाया था। हवन, यज्ञ, पूजा-पाठ आयोजित किये गये। मिठाइयां बांटी गईं। एक मूर्ख सन्यासी भेषधारी राजनीतिक अवसरवादी को मैंने कहते सुना है कि ट्रंप भारतीय संस्कृति के रक्षक हैं। उनकी विजय भारत की महान सनातन संस्कृति की विजय है। (इन मूर्खों को यह पता नहीं कि पूंजी के रथ पर सवार साम्राज्यवादी शासक दुनिया में किसी का मित्र नहीं होता ।उसके लिए धरम दोस्ती संबंध सब कुछ हृदयहीन बाजार के बिकाऊ माल से ज्यादा अहमियत नहीं रखते हैं।)आज वही मोदी के मित्र ट्रम्प भारत को दोतरफा संकट में डाल दिए हैं । 

एक -युद्ध विराम का श्रेय लेकर और दूसरा भारत के ऊपर आरोप मढ़ते हुए 50% टेरिफ लगाकर। ऊपर से सोने में सुहागा यह की रूस से भारत द्वारा तेल खरीद को अपराध करार देते हुए दंडात्मक कार्रवाई की धमकी दे डाली। 

ट्रंप के जीतने के बाद से ही मोदी अनेक तरह से उन्हें रिझाने की कोशिश करते रहे। शपथ ग्रहण के समय से मोदी ट्रंप दरबार पहुंचने के लिए इतने बेताब थे कि बिना निमंत्रण मिलने चले गए। वहां प्रेस कॉन्फ्रेंस में बैठाकर ट्रंप ने मोदी की  खिल्ली उड़ा दी। ट्रंप द्वारा 50% टेरिफ ठोकने के बाद नखशिख किसान विरोधी और किसानों के साथ गद्दारी करने वाले ‌मोदी अब किसानों का नाम लेते हुए भी शर्मा नहीं रहे हैं।

इस विशाल देश का चुना हुआ प्रधानमंत्री व्यक्तिगत क्षति की पाखंड भरी बात करता है। इससे बड़ा पाखंड और क्या हो सकता है एक प्रधानमंत्री के लिए। (शायद वह 8हजार करोड़ के विमान से न चल कर अब पब्लिक ट्रांसपोर्ट से ही यात्रा करेंगे।) खैर जो भी हो मोदी एण्ड कंपनी ने भारत की स्थिति को दुनिया में दयनीय बना दिया है।

ऑपरेशन सिंदूर के समय भारत की विदेश नीति का पूरी तरह से असफल हो जाना चिंता का विषय है। दुनिया में एक भी ऐसा देश नहीं था जो ऑपरेशन सिंदूर पर भारत का पक्ष लिया हो। अधिकांश देश या तो तटस्थ रहे या पाकिस्तान के साथ जा खड़ा हुए। पाकिस्तान पर पैसों की बौछार होने लगी।

यही नहीं चीन, तुर्की जैसे देश खुलकर पाकिस्तान के साथ खड़े थे। इसका एक मात्र कारण मोदी की अज्ञानता प्रचार की लिप्सा और महान बनने की तुच्छ आकांक्षा ही है। जिसकी कीमत देश को चुकानी पड़ रही है। आश्चर्य है अमेरिका और ट्रंप का गुणगान करते-करते मोदी अब पुतिन और सी जिनपिंग के समक्ष शरणागत होने जा रहे हैं। शायद बीजिंग और मास्को पहुंचकर लाख आंख दिखाते हुए आंख में आंख डालकर बात करेंगे।

आरएसएस और भाजपा के स्वाभाविक वैचारिक मित्र साम्राज्यवादी अमेरिका और नस्लवादी इजराइल रहे हैं। संघ के लिए हिटलर और मुसोलिनी के बाद जायनिष्ट इजराइल ही एकमात्र आदर्श राष्ट्र हैं। पिछले 75 वर्षों में संघ परिवार की विदेश नीति इसी धुरी के इर्द-गिद्ध घूमती रही है। आज इसकी कीमत हमारा देश चुका रहा है। इसलिए कहा जाता है कि पाखंड और प्रदर्शन (जैसे लिपटना झपटना झूला झुलाना और गंगा आरती दिखाना, और कृत्रिम प्रेम का प्रदर्शन करते हुए साम्राज्यवादी पूंजीवादी युग के राष्ट्राध्यक्षों के लिए रेड कारपेट बिछाना या नमस्ते ट्रंप जैसे मूर्खता भरे आयोजन करना) के लिए विश्व राजनीति के कठोर यथार्थवादी दौर में कोई जगह नहीं है। आज यही यथार्थ भारत पर पलट वार कर रहा है। 

9 अगस्त भारत छोड़ो आंदोलन के दिन जिस तरह से सम्पूर्ण भारत में लोग सड़कों पर उतरे। उसने 40 के दशक की यादों को ताजा कर दिया है। क्विट इंडिया मूवमेंट के दिन से बढ़ रहा जन विरोध का ज्वार भाजपा आरएसएस के विभाजन कारी वैचारिकी से टकरा रहा है। ‘वोट चोर गद्दी छोड़’ जैसा नारा तेजी से लोकप्रिय होने लगा है।

इस बढ़ते जन सैलाब को रोकने के लिए भाजपा सांप्रदायिक विध्वंस के खतरनाक रास्ते पर लौट आयी है। इसके लिए फिर उत्तर प्रदेश को ही चुना गया। जहां फतेहपुर जिले के एक मकबरे पर बजरंग दल विहिप भाजपा प्रायोजित हजारों अपराधियों का झुंड टूट पड़ा। पुलिस उनकी सुरक्षा करती दिखी। भीड़ मकबरे मैं घुस गई तथा मजार पर तोड़फोड़ करते रहे भगवा झंडा लहरा दिया गया। जानकारी के अनुसार 400 साल से ज्यादा पुराने मकबरे को हिंदू मंदिर बताया जा रहा है।

चौतरफा सवालों में घिरे मोदी और भाजपा फिर विध्वंसक रास्ते पर लौट आये हैं। जगह-जगह भाजपा की गुंडा वाहिनियां आतंक फैलाने में लगी हैं। यह संभावना बढ़ गई है कि राजनीतिक दलों और कार्यकर्ताओं पर हमले तेज हों ।हो सकता है कुछ बड़े नेताओं को विभिन्न तरह के आरोप में फंसाने और गिरफ्तार करने का नया दौर शुरू हो जाए। यह भी हो सकता है कि युद्धोन्माद पैदा किया जाय। क्योंकि सरकार द्वारा बिना हरी झंडी दिखाएं सैन्य अधिकारियों द्वारा पाक के साथ निकट भविष्य में दूसरा युद्ध होने की बात नहीं कही जा सकती है। यह दुर्भाग्य पूर्ण है कि सेना के अधिकारी नीतिगत वक्तव्य देने लगे हैं। एक उच्च पदस्थ सेना के अधिकारी ने युद्ध के लिए तैयार रहने का आवाहन किया है।

सीमाओं पर टकराव के साथ-साथ आंतरिक टकराव के नए-नए मोर्चे खोले जा सकते हैं। भाजपा नेताओं की भाषा तल्ख और आक्रामक हो चुकी है।अनर्गल आरोपों की बौछार हो रही है। मीडिया देश के खिलाफ साजिश रचने का झूठा नैरेटिव गढ़ने लगा है। अब तो राहुल गांधी पर ट्रंप की भाषा बोलने का आरोप मढ़ दिया गया है। कुछ भाजपा नेता तो राहुल गांधी को अमेरिका के साथ मिलकर भारत को अस्थिर करने और पाकिस्तान से मिले होने का आरोप भी लगा रहे हैं। इसके पीछे मोदी शाह की जोड़ी की मिली भगत हो सकती हैं।

ईडी सीबीआई आईटी जैसी संस्थाएं सक्रिय हो गई हैं। कुछ बड़े टारगेट तय किए जाएंगे। जिससे सरकार विरोधी माहौल को बदला जा सके। भ्रष्टाचार वोट चोरी जैसे संगीन सवालों को इसकी आड़ में दबाने का प्रयास होगा। लेकिन आम जन चेतना में मोदी सरकार का षड्यंत्रकारी चरित्र सत्ता का दुरुपयोग और स्वायत्त जांच संस्थाओं को मोदी के व्यक्तिगत हितों के लिए इस्तेमाल करने जैसे मुद्दे आने लगे हैं। आर्थिक संकट के गहरा होने मध्यम वर्ग पर टैक्स और महंगाई की मार तथा रोजगार हीनता और कानून व्यवस्था की खराब होती स्थिति के साथ स्कूलों की बंदी और स्वास्थ्य के बाजारीकारण जैसे सवाल वास्तविक जीवन में स्थान लेने लगे हैं।

एक वोट का नागरिकों को मिला राजनीतिक अधिकार दलितों पिछड़ों आदिवासियों महिलाओं और कमजोर वर्गों के लिए एकमात्र समानता का अधिकार और जीवन को बेहतर बनाने का दिलासा देता है ।उस पर आए खतरे ने समाज को उद्वेलित कर दिया है ।संविधान  बदलने का संघ का चिर प्रतीक्षित लक्ष्य लोगों की समझ में आने लगा है।

अब है संविधान पर खतरा काल्पनिक  सवाल नहीं रहा। समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता जैसे शब्दों को प्रस्तावना से निकलने की बात हो रही है।संविधान का ढांचा रहते हुए भी संविधान को कैसे निष्प्रभावी कर कानून को पक्षपाती बना दिया गया है। यह उमर खालिद और राम रहीम को को मिलने वाले पेरोल की तुलना करके समझा जा सकता है। इसलिए लोग मोदी सरकार द्वारा खड़ा किए गए वास्तविक खतरे को महसूस करने लगे हैं।

वोट चोरी के साथ बेरोजगारी महंगाई भुखमरी कानून व्यवस्था की दयनीय स्थिति सरकार के पक्षपाती चरित्र और दलितों मुसलमानों अल्पसंख्यकों महिलाओं आदिवासियों पर हो रहे जुल्म की बढ़ती घटनाओं में संघर्ष के नए द्वार खुल रहे हैं। संसद सत्र के दौरान ही संघर्ष का केंद्र सड़क की तरफ स्थानांतरित हो गया। हम 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का आवाहन “करो या मरो”  की अनुगूंज “वोट चोर गद्दी छोड़ ” जैसे नारों में सुन सकते हैं। 

एक तथ्य ध्यान देने का है कि इस बार ‘वोट चोर गद्दी छोड़” का नारा क्रांतिकारी वामपंथी पार्टी भाकपा माले ने पटना की क्रांतिकारी धरती से दिया है। इसलिए इसकी अंतर्वस्तु पिछले दिनों के सभी परिवर्तनकारी आवाहनों से सर्वथा भिन्न है। यह नारा इंडिया गठबंधन का जय घोष बन चुका है।

हम 2025 का स्वतंत्रता दिवस गर्म हो रहे वातावरण में मनाने जा रहे हैं। फिजाओं में ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ संविधान बचाओ लोकतंत्र बचाओ का जय घोष चारों तरफ गूंज रहा है। यह आवाज अब राष्ट्रव्यापी आवाज में बदलती जा रही है ।अगर वोट बचाने और संविधान बचाने का मुद्दा गति पकड़ लिया तो हिंदुत्व कॉरपोरेट फासीवादी गठजोड़ के लिए एक बड़ी चुनौती इस बार के 15 अगस्त को मिलने जा रही है।

देखना यह है कि आजाद भारत के तूफानी संघर्षों के काल में –  लोकतंत्र बनाम फासीवाद का अंतरविरोध- सत्ता बदलने के संघर्ष में किस रूप में प्रकट होता है और कॉर्पोरेट हिंदुत्व गठजोड़ के प्रतिगामी मॉडल को परास्त करते हुए कितनी लंबी यात्रा तय कर पता है। इसी पर हमारे स्वतंत्र भारत का भविष्य निर्भर करेगा। वर्तमान दौर में हमें जनता की ताकत और विवेक पर विश्वास बनाए रखना होगा । लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य अमर रहे। हमारा 15 अगस्त चिरंजीवी हो।

(जयप्रकाश नारायण वामपंथी कार्यकर्ता हैं।)

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